कुछ पल के उथले चिंतन से
कभी जनमती है कविता।
वर्षों से मेरे अंतर्मन में
कहीं पनपती है कविता ।।

दो नयनों में बन अश्रु-बिंदु
कभी चमकती है कविता ।
बन अधरों की मुस्कान मेरे
कभी चहकती है कविता ।।

बन सूने बिस्तर की सिलवट
कभी सिसकती है कविता ।
दो बाहों के आलिंगन में
कभी सिमटती है कविता ।।

पूजा के श्रद्धा सुमनों सी
कभी महकती है कविता ।
क्रोध अग्नि की ज्वाला बन कर
कभी धधकती है कविता ।।

वात्सल्य भरी, ममतामय सी
कभी छलकती है कविता ।
आवेश ईर्ष्या द्वेष भरी
कभी उफ़नती है कविता ।।

मेरे मन से उत्पन्न हुई
मेरे भावों से निखर सँवर ।
तेरे निष्ठुर मन तक भी क्या
कभी पहुँचती है कविता ? ।।

– अज्ञात