एक पगडंडी जो पर्वतों के ढलान के साथसाथ उत्तर दिशा की ओर जा रही है और उसी पगडंडी पर मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ, दूर कुछ पर्वतों की एक शृंखला धुंधली सी बर्फ की चादर से ढकी हुई है, सूरज अपनी लालिमा फैलाते हुए पर्वतों के ऊपर रही है, सरसराती हवाएं आँखों को ठंडक पंहुचा रहीं है और हवाओं में थोड़ी नमी सी भी है। कुछ दूर और आगे बढ़ने पर कलकलाहट सी धीमी आवाज़ मेरे कानो में सुनाई दे रही है और ये आवाज़ मेरे हर एक क़दम के साथसाथ तेज़ होती जा रही है, अचानक से पगडंडी के दाएं तरफ़ दो चोटियों के सिथलों के बिच से एक विशाल और हल्का जम चूका झरना अपनी तेज़ आवाज़ के साथ निचे पर्वत की तलहटी से टकरा रहा है और एक नीले पानी की नदी से मिलता हुआ मेरे साथसाथ आगे की तरफ बढ़ता जा रहा है, बिचबीच में सूरज के किरणों से खेलता हुआ उस नदी का पानी कहीं हरा, कहीं गुलाबी तो कहीं आसमानी रंग बदलता सा प्रतीत हो रहा है मानो वो आपको अपनी खूबसूरती दिखा रही हो।

सूरज की रोशनी थोड़ी तेज़ हो रही है और साथ मे बर्फीली ठंडी हवा भी है मानो दोनों में होड़ लगी हो की मेरी शक्ति तेज़ है, कुछ वक़्त और चलने के बाद पगडंडी की बाँयीं तरफ लड़की के फट्टो एवं चीड़ के पत्तो से बनाई हुई एक छोटी सी झोपडी दिखाई दे रही है जिसमें से हलके धुंए का गुब्बार उठ रहा है, इसे देख मेरे क़दम उसकी तरफ़ तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं, यहाँ चाय के पतीले में चाय ठण्ड से लड़ते हुए लकड़ी के आग में खुद को गरम बनाये रखने में जूझ रही है, इस गरम चाय की चुस्की के साथ बर्फ के चादर से लिपटी हुई पूरी वादियां मानो स्वर्ग सी प्रतीत हो रहीं हैं। चीड़ के वो गगनचुंबी पेड़ जैसे आसमान की ऊंचाइयों को छूने की कोशिश कर रहें हैं। बहरहाल अब विश्राम भी हो चूका है तो मै आगे बढ़ता हूँ।

सूरज की रोशनी अब मेरे सिर के ऊपर हलके काले बादलों से जूझते हुए मेरे साथसाथ चलने की कोशिश कर रही है। मेरी साँसे थोड़ी रुक सी गई हैमुझसे कुछ गज दूर लगभग 8-10 बर्फीले सफ़ेद भालू दिखाई दे रहे है, जिनमे से कुछ नदी के किनारे मछलियों को अपने दातों से दबाये उसके स्वाद का आनंद ले रहें हैं और कुछ भालू मानो इंतज़ार में है कि शायद उन्हें भी इन मछलियों का स्वाद चखने मिल जाये। थोड़ी देर और चलने के बाद पगडंडी के दायीं तरफ़ थोड़ी ही दूरी पे एक बड़े से पर्वतनुमा पेड़ जो अपनी टहनियों को फैलाये हुए नदी के किनारे को छू रही है मानो जैसे कि श्री कृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत उठाया हो, जिसके निचे कुछ झूँड में बारहसिंघा दिखाई दे रहें हैं जो आपस में उछलकूद करते हुए खेल रहे हैं, आसमान में रंग बिरंगी चिड़ियाँ और उनके चहचहाने की आवाज़ से एक संगीत की धुन पुरे वादियों में गूँज रही है और वहीं सुनहरी एवं हल्की नीली और कुछ चठक रंग कि तितलियाँ पीले एवं गुलाबी फूलों के ऊपर भ्रमण कर रही हैं और फूलों के रस का आनंद ले रही हैं।

वहीं कुछ दूरी और तय करने के बाद पगडंडी के किनारों को छूते हुए पर्वतों की हल्की ढलान जो नदी को पगडंडी से थोड़ी दूर किए हुए है जहाँ हल्के स्लेटी रंग के हाथियों का झुंड है जिनके दांत काफी लम्बे और पैने है और वो झुण्ड अचानक से मुझे आश्चर्य भाव से देख रहे हैं, ठीक उनके पीछे ही झुरमुट के अंदर गिलहरियों के छोटेछोटे बच्चे उधम मचा रहें हैं। अब तक अच्छी ख़ासी दूरी मैंने तय कर ली है और वादियों की ख़ूबसूरती को निहारते हुए आगे बढ़ रहा हूँ, पगडंडी थोड़ी बाँयी तरफ़ मूड़ी हुई है और नदी का किनारा पगडंडी की दाँयीं तरफ़ से थोड़ी दूर हो चला है, मैं अब उस मोड़ तक पहुँच चुका हूँ अचानक बाँयीं तरफ़ कुछ दूरी पर भेड़ियों का झुण्ड हल्की गुर्राहट के साथ नदी कि तरफ बढ़ते जा रहें हैं, शायद उन्हें मेरे वहाँ होने का आभास नही है ऐसा सोचते हुए मैंने अपने चलने की रफ़्तार कम कर दी है ताकि उन्हें मेरे कदमों की आवाज़ सुनाई दे और मेरे यहाँ होने का आभास हो।

प्रकृति कि अदभुत खूबसूरती देखके ह्रदय एवं मन दोनों में ख़ुशी कि लहर सी उमड़ पड़ी है तभी अचानक ऐसा लग रहा कि उन भेड़ियों ने मुझे देख लिया और डर के कारण मैं भयभीत हूँ।

भेंडियें अब धीरेधीरे मेरी तरफ़ बढ़े रहें हैं, मेरे कदम और ज़ोर से चलने कि क़ोशिश कर रहें हैं, तभी आगे कुछ दूरी पे नदी के उस पार जाने के लिए लकड़ी से बनी हुई लगभग टूट चुकी सी एक पुलिया दिखाई दे रही जिसे पार कर मै शायद नदी के उस पार जा सकता हूँ जहाँ शायद कोई बस्ती हो और ये सोचते हुए मैंने और तेज़ी से अपने कदम उस पुलिया की तरफ़ बढाने शुरू किये लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो मेरे पैर जकड़ से गए हैं, हर एक कदम के साथ दौड़ने कि गति धीमी होती जा रही है, जितना दौड़ रहा हूँ उतना फसता चला जा रहा हूँ।

वहीं बाँयीं तरफ़ से भेड़ियों का झुंड मेरे बिल्कुल क़रीब चूका है, अब मेरे पास कोई और उपाय नहीं है, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शायद मै उस टूटी हुई पुलिया तक नही पहुंच पाउँगा इसलिए मुझे जीवित बचने के लिए उस ठंड से भी ठंडी और लगभग आधी जमी हुई बर्फ की नदी में छलांग लगानी ही पड़ेगी, अगर पुलिया तक पहुंचने की क़ोशिश की तो शायद मेरी मौत निश्चित है, जीवन के इस मोह एवं कश्मकश में लिप्त होकर, अंततः मैंने छलांग लगा ही दिया उस नदी में

हर तरफ सन्नाटा है, पानी की हलकी कलकल आवाज़ मेरे कानो से कुछ कहने की कोशिश कर रही है, जितना सोचा था उससे कही ज्यादा गहरायी में नदी का तल है, पानी उम्मीद से दो सौ गुना ज्यादा ठंडा है, शरीर जमने सा लगा है, दिल की धड़कने धीमी होती जा रही हैं, अब आँखों ने भी साथ छोड़ दिया और पलकें बंद हो गईं हैं….

कुछ देर पश्चात् अचानक से मेरी आँख खुली, सामने का नज़ारा देख मैं चकित हो रहा हूँएक दीवार है जिसे मैंने पहले भी कहीं देखा है, मैं अत्यंत ख़ुश हूँ कि मैं ज़िंदा हूँ, जी हाँमैं ज़िंदा हूँ, लेकिन हृदय के किसी गलियारे में उदासी भी छाई हुई है

हाँ! मैं अपने घर में हूँऔर अब अपने दफ़्तर जाने की तैयारी में अग्रसर हूँ

हाँ वो एक स्वप्न था, ख़ूबसूरत मानो ऐसा की शायद स्वर्ग वैसा ही होगा..

उस स्वप्न को याद करते हुए मैं दफ़्तर पहुँच चुका हूँ।

और इस कहानी को अपने मित्रों को ऐसे सुना रहा हूँ जैसे कि मैंने एक लम्बी छुट्टी ली थी और उस छुट्टी में भ्रमण किए हुए स्थानों की व्याख्या कर रहा हूँ जैसे ये एक सच था

शायद कभी सच भी हो!

उम्मीद है कि ऐसे सपने आप भी देखना पसंद करेंगे..

स्वप्न ही सही किन्तु वास्तविकता से रूबरू तो करायें।